कुमारी स्वेच्छा कोठारी बनाम गीतांजलि मेडिकल कॉलेज: मेडिकल लापरवाही पर न्यायालय का तगड़ा एक्शन 2025 !

स्वेच्छा कोठारी बनाम गीतांजलि मेडिकल कॉलेजभारत में चिकित्सा लापरवाहीः उपभोक्ता संरक्षण के तहत अधिकार और कानूनी मिसालें

स्वेच्छा कोठारी  बनाम गीतांजलि मेडिकल कॉलेज

चिकित्सा का क्षेत्र मानवता की सेवा का सबसे पवित्र माध्यम माना जाता है। डॉक्टर और मरीज के बीच विश्वास का रिश्ता, चिकित्सा प्रणाली की नींव है। हालाँकि, जब इस विश्वास में दरार आती है और उपचार में लापरवाही के कारण मरीज को नुकसान होता है, तो कानूनी हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। भारत में, मरीजों को न केवल सामान्य कानून के तहत, बल्कि विशेष रूप से उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act) के तहत भी सुरक्षा प्राप्त है। यह अधिनियम चिकित्सकों और अस्पतालों द्वारा श्सेवा में कमीश् (deficiency in service) के मामलों में एक शक्तिशाली निवारण तंत्र प्रदान करता है।

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग (NCDRC) द्वारा हाल ही में दिए गए एक महत्वपूर्ण निर्णय में चिकित्सा लापरवाही, विशेषज्ञ की राय और मुआवज़े के निर्धारण जैसे जटिल मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है। यह मामला दिखाता है कि कैसे उपभोक्ता मंच, डॉक्टरों के खिलाफ लापरवाही के दावों का मूल्यांकन करते हैं, खासकर तब जब चिकित्सा प्रोटोकॉल और रोगी की सहमति जैसे बिंदु विवादित हों।

स्वेच्छा कोठारी बनाम गीतांजलि मेडिकल कॉलेज कानूनी लड़ाई का केंद्र: Endoscopic Nasal Polyp Surgery का मामला

यह कानूनी गाथा कुमारी स्वेच्छा कोठारी बनाम गीतांजलि मेडिकल कॉलेज और अस्पताल और अन्य से संबंधित है, जिसमें एक नेजल पॉलिप सर्जरी (Endoscopic Nasal Polyp Surgery) के बाद उत्पन्न हुई गंभीर जटिलताओं पर ध्यान केंद्रित किया गया था।

शिकायतकर्ताओं का आरोप शिकायतकर्ता, कुमारी स्वेच्छा कोठारी (रोगी) और उनके पिता, श्री अरुण कोठारी ने आरोप लगाया कि ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. ए.के. गुप्ता द्वारा 11.04.2008 को की गई सर्जरी में घोर लापरवाही बरती गई थी । उनकी मुख्य शिकायत यह थी कि सर्जरी एक अनिवार्य प्री-ऑपरेटिव सीटी स्कैन (CT Scan of Paranasal Sinuses) के बिना की गई, जो कि नेजल पॉलिप की सीमा और स्थान का पता लगाने के लिए आवश्यक था ।

सर्जरी के तुरंत बाद, कुमारी स्वेच्छा कोठारी को गंभीर सिरदर्द और लगातार दर्द शुरू हो गया। 12.04.2008 को किए गए सीटी स्कैन में पता चला कि उन्हें सबराचनोइड हैमरेज (SAH) हो गया था यह मस्तिष्क में रक्तस्राव की एक गंभीर स्थिति है। बाद में 23.04.2008 को हुए एमआरआई (MRI) स्कैन में खुलासा हुआ कि खोपड़ी के आधार (base of the skull) में एक अस्थि दोष (bony defect) के कारण मस्तिष्क का एक हिस्सा नासिका गुहा (nasal cavity) में आ गया था, जिसे एन्सेफेलोसील (encephalocele) कहा जाता है । शिकायतकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह एन्सेफेलोसील सर्जरी के दौरान हुई चोट के कारण हुआ था ।

अस्पताल और डॉक्टर का बचाव अस्पताल और डॉ. गुप्ता ने लापरवाही के आरोपों का खंडन किया।

उनके बचाव के मुख्य बिंदु निम्नलिखित थे

सीटी स्कैन से इनकार- उन्होंने दावा किया कि मरीज और उनके पिता को सीटी स्कैन की सलाह दी गई थी, लेकिन उन्होंने इस महत्वपूर्ण जाँच को कराने से मना कर दिया था, जिसे अस्पताल के रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया था (“CT PNS advised but patient refused”) ।

मानक प्रक्रियारू उनका तर्क था कि नेजल पॉलीपेक्टॉमी (छंेंस च्वसलचमबजवउल) के लिए प्री-ऑपरेटिव सीटी स्कैन हमेशा अनिवार्य नहीं होता है; यह केवल अधिक जटिल कार्यात्मक एंडोस्कोपिक साइनस सर्जरी के लिए अनिवार्य है, जो यहाँ नहीं की गई थी।

ज्ञात जटिलता- अपीलकर्ताओं ने ज़ोर दिया कि सबराचनोइड हैमरेज SAH एंडोस्कोपिक नेजल सर्जरी की एक दुर्लभ लेकिन ज्ञात जटिलता है, और इसका होना ही लापरवाही का निष्कर्ष नहीं निकालता है ।

विशेषज्ञों द्वारा दोषमुक्ति- डॉ. गुप्ता ने तीन स्वतंत्र चिकित्सा समितियों (आरएनटी मेडिकल कॉलेज, जीएमसीएच, और राजस्थान मेडिकल काउंसिल) की रिपोर्टों का हवाला दिया, जिन्होंने निष्कर्ष निकाला था कि उपचार में कोई सकल (gro) लापरवाही नहीं हुई थी ।

राज्य आयोग का निर्णय और मुआवजा

राजस्थान राज्य आयोग ने रिकॉर्ड और दलीलों की जांच के बाद पाया कि डॉ. ए.के. गुप्ता लापरवाह थे । आयोग ने इस दावे को खारिज कर दिया कि मरीज ने सीटी स्कैन कराने से मना कर दिया था, क्योंकि श्मरीज ने मना कर दियाश् वाली टिप्पणी अलग स्याही और लिखावट में बाद में जोड़ी गई थी । आयोग ने माना कि अनिवार्य सीटी स्कैन के बिना सर्जरी करना, विशेष रूप से एक जटिल शारीरिक क्षेत्र में, उचित सावधानी और देखभाल की कमी को दर्शाता है, जिसके कारण(SAH) और बाद में तंत्रिका संबंधी क्षति हुई ।

राज्य आयोग ने अस्पताल को डॉक्टर के लापरवाह कार्य के लिए परस्पर उत्तरदायी (Nasal Polypectomy) ठहराया और शिकायतकर्ताओं को कुल 17,34,284/- (सत्रह लाख चौंतीस हज़ार दो सौ चौरासी रुपये) का मुआवजा देने का आदेश दिया । इस राशि में शामिल थे

चिकित्सा खर्च के लिए 1,84,284/-

मानसिक और शारीरिक पीड़ा तथा सामान्य जीवन से वंचित रहने के लिए 12,00,000/-

तीन साल के भविष्य के उपचार, पोषण और यात्रा खर्चों के लिए 3,00,000/-

वकील शुल्क और मुकदमा खर्च 50,000/-

जमा राशि पर 9ः प्रति वर्ष की दर से ब्याज

बीमा कंपनी (Oriental Insurance Company Ltd-) को डॉक्टर की प्रोफेशनल इंडेम्निटी पॉलिसी की सीमा तक, यानी 5,00,000/- तक की राशि के लिए संयुक्त रूप से उत्तरदायी ठहराया गया था ।

राष्ट्रीय आयोग (NCDRC) में अपील और अंतिम फैसला

अस्पताल और डॉक्टर ने राज्य आयोग के आदेश को (NCDRC) में चुनौती दी। (NCDRC) ने कई कानूनी और तथ्यात्मक पहलुओं पर विचार किया

1. परिसीमा और उपभोक्ता की परिभाषा (Limitation and Consumer Status ने अपीलकर्ताओं के इस तर्क को खारिज कर दिया कि शिकायत परिसीमा से बाधित (barred by limitation) थी । आयोग ने पाया कि शिकायत 03.05.2010 को दायर की गई थी और उपचार 03.05.2008 तक जारी रहा था, इसलिए शिकायत समय सीमा के भीतर थी । यह तर्क भी खारिज कर दिया गया कि रोगी श्उपभोक्ताश् नहीं था क्योंकि अस्पताल ने स्वीकार किया कि रोगी ने 15,000/- से अधिक का भुगतान किया था, जिससे यह साबित हुआ कि यह सेवा शुल्क के बदले में प्रदान की गई थी।

2. चिकित्सा लापरवाही का निर्धारण- NCDRC ने माना कि राज्य आयोग का यह निष्कर्ष कि अनिवार्य जाँच (सीटी स्कैन) को छोड़ना लापरवाही थी, उचित है। आयोग ने इस बात को स्वीकार किया कि राज्य आयोग ने अस्पताल के रिकॉर्ड में श्रोगी द्वारा इनकार की प्रविष्टि को में “बाद डाला गया” और संदिग्ध पाया था । चूँकि SAH एंडोस्कोपिक सर्जरी की एक ज्ञात गंभीर जटिलता है, इसलिए सर्जरी से पहले पूरी सावधानी और प्रोटोकॉल का पालन करना डॉक्टर का कर्तव्य था। राजस्थान मेडिकल काउंसिल ने भी डॉ. गुप्ता को सर्जरी करते समय अधिक सतर्क रहनेश् की चेतावनी दी थी, जो यह दर्शाता है कि लापरवाही हुई थी, भले ही वह सकल न हो।

3. मुआवजे का पुनर्मूल्यांकन- NCDRC ने अपीलकर्ताओं के इस तर्क को स्वीकार किया कि राज्य आयोग द्वारा दिया गया मुआवजा अत्यधिक और अनुचित था । आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता ने अहमदाबाद में सर्जरी के बाद अपनी चल रही चिकित्सा स्थिति, निरंतर मानसिक पीड़ा या प्रतिबंधित जीवन शैली के परिणामों को स्थापित करने के लिए कोई पुख्ता सबूत पेश नहीं किया था । हर्जाने का निर्धारण निष्पक्ष, उचित, न्यायसंगत और स्थापित हानि या चोट के अनुपात में होना चाहिए ।

NCDRC का अंतिम आदेश- उपरोक्त आधारों पर, NCDRC ने राज्य आयोग के आदेश को आंशिक रूप से संशोधित किया।

डॉ. ए.के. गुप्ता और गीतांजलि मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की कुल संयुक्त देनदारी 10 लाख निर्धारित की गई ।

यह राशि 03.05.2010 से 9ः साधारण ब्याज के साथ देय होगी ।

ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी 5 लाख का भुगतान करने के लिए संयुक्त रूप से उत्तरदायी होगी (ब्याज सहित) । 50,000/- का खर्चा बरकरार रखा गया ।

निष्कर्ष

कुमारी स्वेच्छा कोठारी का मामला भारत में चिकित्सा कानून के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है। यह मामला उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत चिकित्सा लापरवाही के मामलों को स्थापित करने में रोगी के अधिकारों की पुष्टि करता है। यह डॉक्टरों के लिए प्रोटोकॉल के सख्त पालन के महत्व को रेखांकित करता है, विशेष रूप से तब जब अनिवार्य प्री-ऑपरेटिव जाँच जैसे सीटी स्कैन, सर्जरी के परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। यह दिखाता है कि अदालतें, भले ही विशेषज्ञ समिति द्वारा डॉक्टर को दोषमुक्त कर दिया गया हो, अस्पताल के रिकॉर्ड में दस्तावेजीकरण की विसंगतियों और कमी को लापरवाही का सबूत मान सकती हैं । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालतें केवल नुकसान का अनुमान लगाने के बजाय, ठोस सबूतों के आधार पर मुआवजे की राशि तय करने में सावधानी बरतती हैं ।

यह निर्णय चिकित्सा जगत को एक स्पष्ट संदेश देता हैरू सेवा में कमी और स्थापित चिकित्सा मानकों से विचलन के गंभीर कानूनी परिणाम होंगे, लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित करता है कि हर्जाना हानि के अनुपात में ही निर्धारित हो

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